मित्रों पौराणिक समय की मित्रता की बात आती है तो हर किसी को श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता याद आ जाती है लोग सोचने लगते हैं कि कृष्ण कैसे दयालु और समानता में विश्वास रखने वाले थे जो एक दरिद्र ब्राह्मण से मिलने महल के द्वार तक नंगे पांव चले आए थे और फिर सुदामा की दरिद्रता दूर की थी इस कथा से तो हम सभी भलीभांति परिचित हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि सुदामा के अपने पापों के कारण भगवान शिव ने उस का वध किया था आज की इस वीडियो में हम आपको यही कथा बताने जा रहे हैं कि आखिर भगवान शिव को सुदामा का वध क्यों करना ्कार सर ्शक को दृश्य को दर्शकों द डिवाइन टेल्स पर आपका एक बार फिर से स्वागत है स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार गोलोक में सुदामा और विराज नाम की एक कन्या रहा करती थी विराजे भगवान श्री कृष्ण के प्रेम करती थी उधर सुदामा जो उस समय गोलोक में रहता था राजा से प्रेम करने लगा एक दिन की बात है राजा भगवान
श्रीकृष्ण पर मोहित होकर उनके पास चली गई उसी समय राधा भी वहां आ गई और जब उसने बिराजा तथा भगवान श्री कृष्ण को एक साथ देखा तो क्रोध में उन्होंने बिराजा को श्राप दे दिया कि वह गोलोक से पृथ्वी लोक में निवास करेगी इधर सुदामा ने भी राधा को श्राप दे दिया तब राधा ने भी सुदामा को राक्षस योनी में पृथ्वी लोक पर जन्म लेने का श्राप दे दिया उसके बाद सभी अपने निवास को लौट के गए कुछ वर्ष बाद जब फलित होने का समय आया तो सुदामा ने दानव के घर पुत्र के रूप पुत्री रूप में जन्म लिया जिसका नाम शंख क्यों रखा गया और विराज बिराजा धर्म ध्वज के यहां तुलसी के रूप में हुआ है जी के उपदेश से पुष्कर में जाकर ब्रह्मा जी को प्रसन करने के लिए भक्ति पूर्वक तपस्या करने लगा कुछ पश्चात परमपिता ब्रम्हा उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर हुए प्रकट हुए और को वर मांगने को कहा ब्रह्मा जी को अपने सामने देखकर उसने अत्यंत नम्रता से उन्हें अभिवादन किया और फिर ब्रह्मा सेवर मांगते हुए कहा मुझे ऐसा वर दीजिए जिससे मैं देवताओं के लिए हो
तब ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर बोले तथास्तु ऐसा ही होगा फिर उन्होंने संघ को एक उनको एक श्रीकृष्ण कवच प्रदान किया जो सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला था तदनंतर ब्रह्मा जी ने उसे आज्ञा दी कि तुम बद्री बंको जाओ उधर धर्म ध्वज की कन्या तुलसी भाव से तपस्या कर रही है उसके साथ विवाह कर लो इतना कहकर ब्रह्मा जी ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए तो गले में बांध लिया और ब्रह्मा की आज्ञा अनुसार न पर पहुंच ुंचा जा पहुंचा रही थी तुलसी का रूप अत्यंत कमी है और मनोहर था थी उसी को देख कर उसके समीप है गया और मधुर वाणी में उससे बोला सुंदरी तुम कौन हो किसकी पुत्री हो तुम चुपचाप बैठ कर क्या कर रही हो यह सारा रहे रहस्य बताओ बताओ यह मधुर वचन सुनकर तुलसी ने कहा मैं हूं और यहां तक कर रही हूं आप कौन हैं सुख पूर्वक अपने अभीष्ट स्थान को चले जाइए क्योंकि नारी जाति ब्रह्मा आदि को भी मुंह में डाल देने वाली होती है तब ने कहा क्या तुम मुझे नहीं जानती हो अथवा तुमने कभी मेरा नाम नहीं सुना है अरे देवताओं में भगदड़ डालने वाला मैं ही हूं पूर्व काल में श्रीहरि का पार्षद था मेरा नाम सुदामा समय में समय में राधिका जी के श्राप से श्राप से उत्पन्न हुआ शुरू हुआ यह सारी
मुझे ज्ञात है कि श्री कृष्ण के प्रभाव से मुझे अपने पूर्व बना हुआ है और परम पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा से विवाह करने आया हूं जब पूर्वक तुलसी से ऐसा सत्य वचन कहा तब हम प्रसन्न हुए और मुस्कुरा कर के सात्विक विचार से पराजित कर दिया है उसे उपदेश देने लगी उसी समय वहां ब्रह्मा जी प्रकट हुए और कहने लगे तो व्यर्थ में बात कर रहे हो तुम विवाह की विधि से इसका पानी ग्रहण करो क्योंकि निश्चय ही तुम पुरुष हो अभी शादियों में रखा है ऐसी दशा में निपुण निपुण के समागम गुणकारी ही होगा ब्रह्मा जी ने कहा सती साध्वी तुलसी क्या परीक्षा ले रही हो यह तो देवताओं असुरो तथा का मान मर्दन करने वाला है सुंदरी सर्वदा ं में सर्वत्र थान ों पर स्थानों पर करोगी इतना ही नहीं होने पर यह ग्रुप में ही श्रीकृष्ण को प्राप्त होगा और उसकी मृत्यु हो जाने पर तुम भी बैकुंठ में चतुर्भुज भगवान को प्राप्त करोगी इतना कहकर ब्रह्मा अपने धाम को चले गए तभी से तुलसी का पानी किया के अपने पिता के स्थान को चला गया और मनोरम भाव में उस रमणी के साथ बिहार करने लगा फिर कुछ समय पश्चात देव गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से शंख चूर्ण को दानवों का राजा बना दिया गया जिसके बाद संजीव ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया ब्रह्मा जी से मिले वरदान के कारण कोई भी देवता उसके सामने टिक
सके और सभी रणभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए फिर देवी भद्रकाली भद्र काली शक्तियों से युद्ध करने रणभूमि में पधारी पधारे उसके बाद दोनों में भयंकर युद्ध शुरू हो को छ समय पर कुछ समय पश्चात युद्ध भूमि में आकाशवाणी हुई कि हे देवी तुम शंख चूर्ण को युद्ध में पराजित नहीं कर सकती क्योंकि यह तुम्हारे लिए अवध है क्योंकि जब तक चल छोड़ के शरीर पर है देवी कवच है और उसकी पत्नी तुलसी का सतीत्व खंडित है तब तक इसे रणभूमि में कोई नहीं हरा सकता यह सुन देवी भद्रकाली भगवान शिव के पास पहुंची और उन्होंने आकाशवाणी की बातें बताएं तब भगवान शिव श्री विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें शंख चूर्ण के बंद करने के लिए प्रेरित किया ण किया ज्ञा से की आज्ञा से विष्णु जी वहां से चल पड़े उन्होंने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और शंख चूर्ण के निकट जाकर बोले धर्मेंद्र दानवेंद्रो इस समय में आपका याचक होकर आया हूं तो मुझे बिच्छू ने कहा आपको क्या चाहिए तब विष्णु जी बोले पहले यह वचन दो कि मैं जो तुमसे
मांग लूंगा उसे स्वीकार करोगे ॐ के उच्चारण के साथ वचन स्वीकार कर लिया तब भगवान विष्णु रूपी ब्राह्मण ने छल पूर्वक कहा मैं तुम्हारा कवर चाहता हूं यह सुनकर दानव ने प्राण प्रिय था उस ब्राह्मण को दे दिया इस प्रकार श्री हरि ने माया द्वारा उसे वापस ले लिया और फिर का रूप धारण करके देवी तुलसी के पास पहुंचे पहुंच कर पहुंच कर पहुंचकर विष्णु जी तुलसी से बहुत सी बातें करने लगे तदनंतर उनके साथ रमण किया किंतु कुछ समय रावण करने के पश्चात देवी तुलसी के मन में संदेह उत्पन्न होने पर वह ₹1 विष्णु जी से पूछने लगी तुम कौन हो दोस्त लागी माया द्वारा मेरा उपभोग करने वाला तू कौन है तूने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया हमें अभी तुझे श्राप देती हूं उसके बाद तुलसी का वचन सुनकर श्री हरि श्री हरि अपने वास्तविक रूप में आ गए तब उसको देखकर तुलसी ने लक्षणों से पहचान लिया कि यह साक्षात विष्णु है परंतु उसका पति व्रत से नष्ट हो चुका था इसलिए कुपित होकर विष्णु जी से कहने लगी हे विष्णु तुम्हारा मन पत्थर के सदस्य है मात्र भी दया नहीं मेरे पति के भंग हो जाने से निश्चय ही मेरे स्वामी मारे गए क्योंकि तुम पहचान सदस्य कठोर दया रहे और दुष्ट हो इसलिए तो मेरे तो मेरे हिसाब से पाषाण स्वरूप ही हो जाओ इतना कह कर कहकर शंख चूर कि वह सती साध्वी पत्नी तुलसी फूट-फूट कर रोने ोक ा काकुल हो कर बिना होकर बिन आप करने लगी इतने में वहां भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रकट हो गए और उन्होंने तुलसी को समझाते हुए कहा देवी अब तुम दुख को दूर करने वाली मेरी बात सुनो और श्रीहरि भी स्वस्थ मन से शुरू करें उसे शेयर करें क्योंकि तुम दोनों के लिए जो सुख कारक होगा वही मैं कहूंगा बस मनोरथ को लेकर तब किया था उसी तपस्या का फल है भला कैसे हो सकता है इसलिए तुम्हें उसके अनुरूप ही फल प्राप्त हुआ है शरीर को त्याग कर लो और लक्ष्मी के समान हो हो कर नित्य श्री हरि के साथ वैकुंठ में बिहार करती रहो तुम्हारा शरीर जिसे तुम छोड़ दोगी नदी के रूप में परिवर्तित हो जाएगा वहीं भारत वर्ष में पूर्ण रूप वह नदी भारत में किस नाम से प्रसिद्ध होगी महादेवी कुछ काम के पश्चात मेरे भर के प्रभाव से देव पूजन सामग्री में तुलसी का पौधा स्थान हो जाएगा
स्वर्ग लोक में मृत्यु लोक में तथा पाताल में सदा श्री हरि के गी और पुष्पों में श्रेष्ठ तुलसी का वृक्ष हो जाओगी तो बैकुंठ में दिव्य रूप धारण ई-रिक्शा देता श्रीदेवी बंद कर बनकर एकांत में श्री श्रीहरि के साथ मिलाकर ओगी मिला करो कि उधर भारतवर्ष में जो नदियों की अधिष्ठात्री देवी होगी वह परम पुण्य प्रदान करने वाली होगी और श्रीहरि के अंश भूत श्री हरि के गुण सागर की पत्नी बनेगी तथा श्री हरि तुम्हारे शॉप तुम्हारा पत्थर का रूप धारण करके भारत में गंडकी नदी के जल के निकट निवास करेंगे उस पत्थर को काटकर उसके मध्य में चक्र का आकार बनाएंगे उसके भेद से वह अत्यंत प्रदान करने वाली शालिग्राम शिला कहलाए की और चक्र के भेद से उसका लक्ष्मी नारायण आदि भी नाम होगा विक्रमशिला और वृक्ष स्वरुप तुलसी का समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकार के पुण्य गुणों की वृद्धि करने वाला होगा जो शालिग्राम शिला के ऊपर से तुलसी पत्र को दूर करेगा उसे जन्मांतर में स्त्रियों की प्राप्ति होगी दो र कर दूर करके तुलसी पत्र को हटाएगा वहीं होगा और सात जन्मो तक रोगी बना रहेगा जो महा और शंकु एकत्र रखकर उनकी रक्षा करता है वह श्री
को प्यारा होता है इस प्रकार कहकर शंकर जी उस समय शालिग्राम शिला और तुलसी के परम पुण्य दायक महात्मा का वर्णन किया तत्पश्चात श्री हरि को तथा तुलसी को आनंदित कर के अंतर्धान हो गये इस प्रकार सदा सब पुरुषों का कल्याण करने वाले शंभू अपने स्थान को चले गए इधर शंभू का कथन सुनकर तुलसी को बड़ी प्रसन्नता हुई उसने अपने शरीर का परित्याग करके करके दिव्य रूप धारण कर लिया तब कमलापति विष्णु उसे साथ लेकर बैकुंठ को चले गए उसके छोड़े हुए शरीर से गंडकी नदी प्रकट हुई और भगवान अछूत भी उसके तट पर मनुष्यों को पुण्य प्रदान करने वाली शीला के रूप में परिणत हो गए उनमें जोशीलाय गंदगी के जल्द गिराती है ब्रहम पूर्ण होती है और जो स्थल पर ही रह जाती हैं उन्हें पिंगला कहा जाता है और वे प्राणियों के लिए संताप कारक होती है तो दर्शकों में करता हूं कि आप जान गए होंगे कि आखिर भगवान ा म ा का वध का वध क्यों और कब किया था अगर आपको हमारी यह कथा पसंद आई हो तो इस वीडियो को ज्यादा शेयर करें और साथ ही ऐसी धार्मिक कथाओं को जाने के लिए अभी हमारे ब्लॉग को सब्सक्राइब करें